Description
अनेक जन्म संप्राप्त, कर्म बंध विदाहिने आत्म ज्ञान प्रदानेन, तस्मै श्री गुरुवे नमः ध्यान मूलं गुरोर्मूर्ति पूजा मूलं गुरुपदं मंत्र मूलं गुरुर्रवाकयं मोक्ष मूलं गुरु कृपा।
बड़े भाग्य से ऐसा संजोग होता है जब गुरु गोविन्द एक ही स्वरूप में अपनी विराट सत्ता का दर्शन कराता है। यही अहैतुकी कृपा की मूल पकड़ है। एक बार यह भक्त की समझ में उतर गया तो वह एकनिष्ठ रह कर, भवसागर पार हो जाता है।
परम पूजनीय बाबा नीबकरौरी महाराज इसी श्रेणी के समर्थ मानव रूप में विराट का द्योतक हैं। जिसने उनका स्वरूप जान लिया उसका कल्याण है। हर कल्प के राम के संकल्प को पूर्ण करने के लिए हनुमान भी अवतरित होते हैं। महाराज जी की सेवा और कार्यों को परिपूर्ण करने के लिए पूजनीया सिद्धी मां ने जन्म लिया। राम ने हनुमान को अपना स्वरूप जताया। सिद्धी मां ने भी पूर्णतया समर्पित होकर महाराज जी की कृपा से उनका स्वरूप जाना।
इसी राम हनुमान लीला का (श्री महाराज जी और मां) का विवरण अपनी लेखनी से लिपिबद्ध करने का प्रयास किया है। आशा है आप इस पुस्तक को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य जतायेंगे।
विषय सूची
समर्पण
संस्करण 2024
लेखक की बात
रब्बू दा का संदेश
भूमिका
परिचय
अध्याय 1 कैंची आश्रम एवं प्रसाद
अध्याय 2 आश्रम का संचालनः प्रशासन एवं प्रारूप
अध्याय 3 आश्रम का एक सामान्य दिवस
अध्याय 4 आश्रम में रात्रि काल
अध्याय 5 श्री गुरुदेव भौतिक उपस्थिति
अध्याय 6 बाबा एवं महावीर हनुमान
अध्याय 7 आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रेक्षण
अध्याय 8 पश्चिमी देशों से आये अनुयायी
अध्याय 9 बाबा की कृपा एवं वरदान
अध्याय 10 साधुत्व एवं देवत्व
अध्याय 11 मेरा अनुभव
अध्याय 12 प्रारंभिक स्मृतियाँ
अध्याय 13 श्री माँ बाबा के बाद प्रारंभिक वर्ष
अध्याय 14 श्री माँ सुदृढ़ीकरण
अध्याय 15 सर्वोच्च श्री माँ
अध्याय 16 दिव्यता अब और हमेशा
अध्याय 17 आदि सिद्ध महाप्रयाण
इति
निवेदन





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